कहत बिरह में
एक थी चिड़िया,
सुन री सखी
अब मोर बतरिया।
बिरह बढ़त अब
कहाँ में खोजूं,
दिन भई गये
तब,
मोरि सांवरिया।।
सुन की सखी
तब,
बिरह की बोली,
उड़त चला अब
खोजन,
तोर सांवरिया।
ऐसी सखी
जो,
बिरह की बेदी,
संगी चले मोर
खोज सांवरिया।।
प्रेम मगन है
वही अगन है,
चली साथ तब
सखी है बढ़िया।
ऐसी सखी जो
भूले हैं सब कुछ,
चली मगन है
एक थी चिड़िया।।
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