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गौरैया आस्तिक है

Geetanjali

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरे घर के थोड़ा आगे, एक मंदिर पड़ता है,
        
                                                    
                            
उस मंदिर के आंगन में, एक पीपल का पेड़ अड़ता है।
मेरी खिड़की से उस पेड़ का कुछ अंग दिखता है,
जिसपे मेरी दोस्त गौरैया का घर बसता है।

मंदिर के शिखर पर, एक लंबा सा स्पीकर लटकता है,
जिससे हर सुबह शाम, आस्था का भजन निकलता है।
आस्था का भजन गौरैया के स्वर से जब मिलता है,
तब मेरा मन थोड़ा और अतिनंदित हो उठता है।

कुछ रोज़ पहले, मोहल्ले में नई बसावट आती है,
जो मंदिर के स्पीकर को थोड़ा तेज़ बताती है।
अब जब गौरैया मेरी खिड़की तक आती है,
तो वे स्पीकर के भजन को कहीं पीछे छोड़ आती है।

फिर कुछ रोज़ बाद, मंदिर के बाजू में एक नया घर निकल आता है,
जो पीपल की टहनियों को ‘अपने’ घर का दुश्मन पाता है।
कल दोपहर मेरी दोस्त गौरैया का घर उजड़ जाता है,
क्योंकि पीपल का कुछ अंग ज़मीन से मिल जाता है।

आज सुबह, जब उजियारा मेरी खिड़की तक आता है,
तो वो खुद को कुछ गुमसुम सा पाता है।
न आती है किसी भजन की आवाज़,
न आती है मेरी दोस्त गौरैया मेरे पास।

भजन को ढूंढते जो वे उड़ जाती है,
फिर मंदिर के आंगन में कभी लौट के न आती है।
सब असंवेदनशील और परंपरावादी लोग वे मेरे पास ही छोड़ जाती है,
देखो, मेरी दोस्त गौरैया आज हम सबसे आज़ाद हो जाती है।
- गीतांजलि
एक महीने पहले
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