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कुछ रह गई

Geeta Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकल गये,
        
                                                    
                            
कुछ जख़्म छिप गए,
कुछ हरे रह गए।

कदमों के निशां उड़ती रेत के साए में
यूं सिमट गए,
कुछ निशां छिप गए,
कुछ बाकी रह गए।

सावन की बूदें इस तरह धरा पर गिर गई,
कुछ बूदें छिप गई,
कुछ जगह हरा भरा कर गई।

- गीत 


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6 वर्ष पहले
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Ankit Kumar

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