ज़िन्दगी की दौड़ में आगे निकल गये,
कुछ जख़्म छिप गए,
कुछ हरे रह गए।
कदमों के निशां उड़ती रेत के साए में
यूं सिमट गए,
कुछ निशां छिप गए,
कुछ बाकी रह गए।
सावन की बूदें इस तरह धरा पर गिर गई,
कुछ बूदें छिप गई,
कुछ जगह हरा भरा कर गई।
- गीत
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