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बरसात की बात

Gauri Agarwal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वह सोंधी सी खुशबू मचल कर फैल जाती है
        
                                                    
                            
आ चुकी है बारिश कानों में कह जाती है ....

गिरती बूंद पानी की अविरल धारे ....
फीकी पड़ जाती है बारिश के आगे बहारें ....

मन चंचल सा इधर-उधर भागता सा है...
मस्तियां यह अल्हड़ पन की मांगता सा है...

भूल जाता है मन सारी जिम्मेदारियां ....
घुल जाती है इन बूंदों में सारी परेशानियां .....

सावन का मौसम यह बरसात की बात ....
पर गरीबों की नहीं होती है यह बरसात.....

टूटी झोपड़ी उनकी भींगते बदन उनके .....
भींगती लड़कियां चूल्हे की बच्चे नग्न उनके .....

भूख से व्याकुल वह हो जाते हैं उसे रात में .....
कोई होता है खुश पर वे दुखी हो जाते हैं बरसात में ...

यह बरसात खुशियां तभी लाएगी ....
जब उनके चेहरे पर भी मुस्कान आएगी...
2 वर्ष पहले
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