मेरा गाँव मुझसे छूट गया,
मेरा बचपन मुझसे रूठ गया।
नए पथों को गढ़ने में,
मेरा प्यारा गाँव छूट गया।
वो पीपल की छाया, वो बरगद की माया,
वो खेतों में फैली हरियाली की काया।
वो मिट्टी की सौंधी महक,
वो पुरवइया से मीठी चहक।
वो कच्चे घरों की ठंडी छाँव,
वो दादी की लोरी, वो ममता का गाँव।
शहर की चमक में मैं खो सा गया,
भीड़ में भी मैं अकेला हो गया।
पर रात में अब भी वही सपना आता है,
वही धूल भरा रास्ता मुझे बुलाता है।
-गौरव कुमार तिवारी