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लेखक गौरव पाल छत्रपति यात्रा

Gaurav Chhatrapati

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अम्बेडकर नगर की पावन माटी,
        
                                                    
                            
जहाँ बसी है यादें खाँटी।
भोर हुई जब अरुणिम बेला,
मन में जागा सपना अलबेला।

घर आँगन को प्रणाम किया,
माता-पिता का नाम लिया।
आशीषों का लेकर सार,
चल पड़ा मैं पथ की ओर अपार।

नभ में सूरज हँसता आया,
किरणों ने जग को चमकाया।
मंद-मंद चलती थी बयार,
जैसे दे रही शुभ समाचार।

राहों में खेत हरे-भरे थे,
मानो धरती पर स्वर्ग उतरे थे।
गेहूँ, धान की लहराती बाली,
मन को लगती छवि मतवाली।

पक्षी गाते मधुर तराने,
सुनकर झूम उठे थे ठिकाने।
कोयल की मीठी तान सुहानी,
लगती जैसे प्यारी कहानी।

गाँव-गाँव में जीवन प्यारा,
हर चेहरे पर भाव हमारा।
बच्चे हँसते खेल दिखाते,
बुजुर्ग हमें आशीष सुनाते।

रास्ते भर नदियाँ मिलीं,
जलधाराएँ निर्मल थीं खिलीं।
ताल-तलैया, पोखर न्यारे,
जैसे मोती बिखरे सारे।

चलती गाड़ी गान सुनाती,
नव उत्साह हृदय में लाती।
पहियों की मधुरिम झंकार,
जैसे वीणा के झंकार।

कहीं नगर थे, कहीं बाजार,
कहीं सजे थे सुंदर द्वार।
कहीं मंदिर की घंटी बजती,
कहीं अजान नभ में सजती।

भारत भूमि की यही निशानी,
सबमें बसती प्रेम कहानी।
भाषा भिन्न, वेश अनेक,
पर सबके मन एक ही नेक।

ज्यों-ज्यों पथ आगे बढ़ता जाता,
मन उत्सुकता से भरता जाता।
प्रयागराज का नाम सुनाते,
राहगीर भी मुस्काते जाते।

आखिर वह शुभ घड़ी भी आई,
संगम नगरी पास दिखाई।
मन ने हर्षित नृत्य किया,
ईश्वर का फिर स्मरण किया।

गंगा माता श्वेत सलोनी,
यमुना जलधारा मनमोनी।
सरस्वती का गुप्त प्रवाह,
देता सबको पावन चाह।

तीनों नदियों का संगम प्यारा,
जग में जिसका नाम न्यारा।
जहाँ ऋषियों ने तप किया,
ज्ञान-ज्योति का दीप दिया।

घाटों पर श्रद्धा उमड़ रही थी,
भक्ति धारा बह रही थी।
दीपक जैसे तारे लगते,
जल में सुंदर चित्र सजते।

मंदिर, मठ और साधु-संत,
सबके मुख पर तेज अनंत।
हर कोई प्रेम से बुलाता,
पावनता का पाठ पढ़ाता।

मैंने देखा किला पुराना,
इतिहासों का गौरवखाना।
हर पत्थर कुछ कहता था,
भारत का यश बहता था।

मन ने सोचा धन्य ये धरा,
जहाँ मिला इतना उजियारा।
यात्रा केवल पथ न थी,
जीवन की मधुर कथा यही।

अम्बेडकर नगर से चला था मैं,
सपनों को लेकर चला था मैं।
प्रयागराज ने दिया उपहार,
स्मृतियों का अनुपम संसार।

जब लौटूंगा अपने घर-द्वारे,
कहूँगा सबको दृश्य ये सारे।
कैसी सुंदर रही यह राह,
कैसा मधुर मिला था चाह।

जीवन में जो यात्रा होती,
नव शिक्षा की गाथा बोती।
अम्बेडकर नगर से संगम धाम,
सदा रहेगा इसका नाम।

यह महायात्रा याद रहेगी,
मन वीणा में गूँज बहेगी।
जब-जब स्मरण इसे करूँगा,
हर्षित होकर नमन करूँगा।
3 महीने पहले
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