मिट्टी ही तो हैं हम
तभी तो मिट्टी बन जाते हैं
कभी जल कर, कभी दफ़न होकर
यही है कुदरत से, रिश्ता हमारा
पत्थर और पेड़ से अलग नहीं हैं हम
सब एक ही डोर से तो बंधे हैं
फिर क्यों भाग रहे हैं हम, मिट्टी से दूर
जबकि मिट्टी ही बन जाना है हमें
कभी जल कर
कभी दफ़न होकर