विज्ञापन

बिछड़ के तुझे कहां मैं बाहर में हूं

Furkan Rahi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह जिंदगी मौत से भी बदतर है*
        
                                                    
                            
बिछड़ के तुझे कहां मैं बाहर में हूँ*

दिल में है आज तक तेरी मूरत
तुझसे मिलने को रहता बेकरार में हूँ

सांस लेता भी हूँ तो दम सा घुटता है*
एक मुद्दत से तेरी यादों के मज़ार में हूँ*

तेरे दयार की हर गली अब भी मुझसे पूछे है*
ऐसा लगता है मैं अब भी तेरे इंतज़ार में हूँ
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile