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बंद कमरों में कभी बहार नहीं होती।

Ektarajesh Joshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ दर्द शब्दों से बयां नहीं होते ,
        
                                                    
                            
सिसकियों से निकली हुई आहटें
दूर तक नहीं जाती,
घुट घुट कर जी लेते हैं मरहूम अपनी मिल्कियतों में,
बंद कमरों में कभी बहार नहीं होती।
एक महीने पहले
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