विज्ञापन

बंद कमरों में कभी बहार नहीं होती।

Ektarajesh Joshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ दर्द शब्दों से बयां नहीं होते ,
        
                                                    
                            
सिसकियों से निकली हुई आहटें
दूर तक नहीं जाती,
घुट घुट कर जी लेते हैं मरहूम अपनी मिल्कियतों में,
बंद कमरों में कभी बहार नहीं होती।
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all