तुझी से शब्द पाए हैं, तुझी से ज्ञान पाया है,
तुझी को पूज कर हमने, जगत् में मान पाया है।
लिखूँ कैसे समर में प्रेम-पाती आपको माँ मैं,
तेरी ही आरती गाकर, नया सम्मान पाया है॥
सिखाया राम का पावन, हमें आधार भी तूने,
दिया तुलसी-कबीरा का, अमिट विस्तार भी तूने।
हमारा आचरण तू है, हमारी चेतना तू है,
सिखाया हर हृदय को प्रेम का व्यवहार भी तूने॥
समुंदर पार भी गूँजे, तेरी आवाज़ की सरगम,
तेरी ही गोद में आकर, मिटे संसार के सब ग़म।
बना लें हम तुझे जग में, नई पहचान अपनी माँ,
तेरी सेवा में अर्पित हो, हमारा सुख, हमारा गम॥
तेरी सेवा करेंगे हम, यही संकल्प है अपना,
तुझे जग-मंच पर पूजें, यही माँ आज है सपना।
न भटकेंगे कभी भी हम, तेरी ममता भुलाकर के,
तुझी से है जुड़ा माँ आज, मेरा नाम भी अपना॥
- सन्तोष कुमार शुक्ला 'सार्थक'