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"रावण जलाएँ रावण"

DrPradeep Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक अकेले रावण के, कितने पुतले बना रहे,
        
                                                    
                            
सिर पर मुकुट लगाकर, पेट पटाखों से सजा रहे।
स्वयं के भीतर झाँका नहीं, न राम के आदर्श अपना रहे,
एक अकेले रावण को, कितने रावण जला रहे।
एक राम थे मर्यादा पुरुषोत्तम, रावण भी विद्वान हुआ,
वेद-शास्त्र का ज्ञाता होकर, अहंकार में चूर हुआ।
सीता माँ का हरण किया, यह उससे घोर अधर्म हुआ,
उनकी इच्छा के विरुद्ध न छुआ, फिर भी कुल का नाश हुआ।
आज के रावण ऐसे हैं, मानवता को शर्मसार कर रहे,
चंद पैसों की खातिर, नारी का सम्मान तार-तार कर रहे।
भरी भीड़ में अबलाओं की, अस्मत तक लूटे जा रहे,
एक अकेले रावण को, कितने रावण जला रहे।
चेहरे पर सज्जनता ओढ़े, मन में कपट छिपा रहे,
मुख से राम का नाम जपें, कर्मों से रावण बनते जा रहे।
अपने भीतर बसे दशानन को, क्यों नहीं अब ये मिटा रहे?
एक अकेले रावण को, कितने रावण जला रहे।
हर वर्ष रावण जलता है, फिर भी पाप बढ़ते जा रहे,
झूठ, कपट और लोभ के पुतले, मन में रोज सजा रहे।
पहले अपने मन का रावण, क्यों नहीं तुम जला रहे?
एक अकेले रावण को, कितने रावण जला रहे।
रामराज्य की बातें करते, राम के आदर्श भुला रहे,
सत्य, धर्म और मर्यादा को, अपने हाथों मिटा रहे।
बाहर रावण जलाने वाले, भीतर रावण पाल रहे,
एक अकेले रावण को, कितने रावण जला रहे।
कागज़ का रावण जलाकर, कैसी विजय मना रहे?
मन में बैठे दस-दस रावण, क्यों नहीं नज़र आ रहे?
पहले अपने कर्म सुधारो, क्यों दुनिया को समझा रहे?
एक अकेले रावण को, कितने रावण जला रहे।
राम बनना कठिन है जग में, रावण बनते जा रहे,
अपने अवगुण छिपाकर, दूसरों के दोष गिना रहे।
जिस दिन अपने मन का रावण, सचमुच तुम जला पाओगे,
उस दिन बिना पुतला जलाए, सच्ची विजयपताका लहरा पाओगे।
-प्रदीप बाबू
 
2 दिन पहले
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