"मचल गई राधारानी"
मचल गई राधारानी, ठाकुर जी के आने से,
मन-मंदिर में दीप जले, श्याम के मुस्काने से।
झूम रही है कदंब की डाली, यमुना लहरें गाए,
मंद-मंद पवन का झोंका, श्याम-संदेशा लाए।
श्यामसुंदर की छवि को सोचे, नैन हुए मतवाले,
राधा जी के मन आज उमड़े, प्रेम-सुधा के प्याले।
मचल गई राधे रानी, ठाकुर जी के आने से।
खिल उठीं ब्रज की गलियाँ, श्याम-सुधा बरसाने से,
कुंज-गली में फूल खिले हैं, महका ब्रज का मेला।
सखियाँ बोलीं, “राधे जू से आज मिलन की बेला।”
पायल छनके, कंगन खनके, महके फूलन-हारी,
आज सजी है ब्रज की धरती, दुल्हन जैसे न्यारी।
दूर कहीं से बाँसुरी बोली—“राधे! राधे!” नाम,
सुनते ही सब भूल गए, छोड़ा अपना काम।
एक झलक की आस लगी है, एक मिलन की चाह,
कृष्ण बिना सब सूना लागे, जीवन की हर राह।
राधा में श्याम बसे हैं, श्याम में राधा प्यारी,
दो तन जैसे एक प्राण हों, प्रीति बनी सुखकारी।
जिसने इस प्रेम को जाना, उसने प्रभु को पाया,
राधे-श्याम के नाम ने, जग को प्रेम सिखाया।
मचल गई राधारानी, ठाकुर जी के आने से,
नाच उठा सारा वृंदावन, प्रेम-सुधा बरसाने से।
ढोलक बाजे, मंजीरा बाजे, गूँजे जय-जयकार,
ब्रज की धरती धन्य हुई, आए नंदकुमार।
राधा हँसी तो फूल झरे हैं, श्याम हँसे मुस्काएँ,
दोऊ जनन की छवि देखत, सखियाँ नीर बहाएँ।
राधे-राधे नाम पुकारो, वृषभानु दुलारी का,
श्याम-श्याम गुण गाओ मिलकर, कुंजबिहारी का।
राधा नाम अधर पर रख लो, मिट जाएँ सब पीर,
श्याम नाम की धुन में खोकर, हो जाए मन अधीर।
मचल गई राधारानी, ठाकुर जी के आने से,
मन-मंदिर में दीप जले, श्याम के मुस्काने से।