" किराए का मकान सवालो की दुकान "
शहर में आए घर की ख़ातिर, आँखों में अरमान लिए,
सोचा था छत मिल जाएगी, कुछ सुकून के पल जिए।
मगर मकान की चौखट पर, सवालों की कतार मिली,
कमरा तो दिखलाया हमको, पहले शर्तों की दीवार मिली।
जाति बताओ, गोत्र बताओ, कहाँ तुम्हारा गाँव?
खाते क्या हो, पीते क्या हो, क्या है तुम्हारा भाव?
शराब न पीना, दोस्त न लाना, देर से घर मत आना,
चप्पल गिनकर बतलाना, कौन गया है, कौन है आना!
किराया पूरा चाहिए, पर विश्वास अधूरा क्यों?
घर देने का वादा है, फिर इतना पहरा क्यों?
हम रहने आए हैं साहब, कोई गुनहगार नहीं,
बस छत की तलाश में आए हैं,
किसी की दुनिया छीनने नहीं।
नियम बनाना उचित है, संपत्ति का अधिकार ,
पर हर बात में शक करना, यह कैसा व्यवहार ?
लड़का हो या लड़की, सबको जीने का हक़ है,
इज़्ज़त से रहने की चाहत, हर इंसान का हक़ है।
जाति से नहीं, कर्मों से इंसान पहचाना जाए,
गोत्र नहीं, उसके व्यवहार से विश्वास कमाया जाए।
चप्पलें गिनने से पहले, नीयत को समझिए आप,
हर किराएदार गलत नहीं, हर चेहरा नहीं ख़राब।
मकान ईंटों से बनता है, घर बनता विश्वास से,
रिश्ते नहीं निभते साहब, हर पल के संदेह से।
किराया लीजिए खुशी से, नियम भी रखिए ज़रूर,
पर सम्मान की चाबी से, खोलिए दिल का दरवाज़ा भरपूर।
आज किराएदार खड़ा है, कल आप भी हो सकते हैं,
अपने शहर से दूर कहीं, आप भी घर खोज सकते हैं।
तब याद आएगा शायद, यह छोटा-सा पैग़ाम—
इंसानियत बड़ी होती है, जाति-गोत्र से नहीं बनता इंसान का नाम।
घर दीजिए तो दिल से दीजिए, शक की दीवार न खड़ी कीजिए,
किराएदार को किराएदार नहीं, पहले इंसान समझिए।
क्योंकि मकान की कीमत किराए से चुक जाती है,
मगर अपमान की चोट दिल में बहुत देर तक रह जाती है।
-प्रदीप बाबू