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शहर की इस भीड़ में ना जाने क्या क्या खो गया

Dreamboy Atul

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शहर की इस भीड़ में ना जाने क्या क्या खो गया।
        
                                                    
                            
अब वो खप्पर के घर नहीं रह गया।
मिट्टी से दीवारें छूट गई, और वो आँगन की तुलसी छूट गई।
वो नीम का दातुन छूट गया।
और आम का छांव छूट गया।
गाँव की दिवाली छूटी, शहरों के अवकाशों में,
मन का सुकुन अब कहीं खो गया
अब गाँव में सीमेंट का घर बन के रह गया।।
कास की वो झाड़ू छुटा, मिट्टी का लेपन छूट गया।
पानी अब बस बोतल में क़ैद है, गाँव में पानी का मटका छूट गया।
हसी मज़ाक के रिश्ते छूटे, हसी की ठिठोलिया छूट गये।
जीजा – साली, देवर – भाभी, मस्ती की बोलिया छूट गये।
3 महीने पहले
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