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यादों की वो मधुर रैना

DR. SURESH

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धीरे-धीरे ढलती वो रैना,
        
                                                    
                            
यादों की है मधुर रैना।
वो पल जो बीते साथ हमारे,
आज भी मन को बहलाए।
तेरे मेरे मिलन की वो रैना,
बन गई अब तो एक सपना।

चुपके-चुपके बातें करना,
नैनों से सब कुछ कह जाना।
उन तारों की ठंडी छाँव में,
प्रेम कहानी अपनी गढ़ना।
कैसी थी वो अलबेली रैना,
जो अब बस है मन का गहना।

मौसम बदले, साल भी बीते,
पर ना बदली प्रीत ये अपनी।
हर धड़कन में तू ही समाई,
हर साँस में तेरा ही नाम।
आ भी जा अब मेरी सजना,
फिर से सजा वो प्रेम रैना।

जीवन पथ पर संग जो चले,
हर मुश्किल आसान हो गई।
तेरी बाहों का जो सहारा मिला,
हर राह मंजिल तक आ गई।
अब ना सहे ये विरह की रैना,
फिर से मिलन की आस जगी है ना।

यादों की ये मधुर रैना,
सदा रहे मन में ये प्रेम रैना।
फिर से हो वही मिलन सुहाना,
हर जनम हो अपना फसाना।
ये रैना, ये रैना, ये प्रेम रैना,
बन जाए हमारी अमर रैना।
एक वर्ष पहले
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