स्त्री का कोना
घर के भूगोल में चाहिए एक कोना,
जहाँ स्त्री खुलकर साँस ले समझकर अपना।
न बच्चों की किताबें, न पिता की कुर्सी,
न दादी‑दादा का आँगन, न रसोई की हलचल सी।
वो कोना हो जहाँ उसकी पहचान जगे,
जहाँ सपनों को पंखुड़ियाँ खुलकर लगे।
जहाँ थकान की परछाइयाँ मिट जाएँ,
और मन की धुनें कविता बन जाएँ।
माँ, पत्नी, बहू के किरदार से परे,
वो खुद से मिले, अपने स्वर में खिले।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं — यह कोना है ज़रूरी ,
जहाँ स्त्री अपने आप से रहे जुड़ी।
उस कोने में हो उजियारा, हो शांति,
वहाँ लिखे वो अपने ख्वाबों की कांति।
घर के भूगोल में उसका भी स्थान हो,
तभी तो घर सचमुच महान हो।
-शिव राय पुरी