विज्ञापन

भारत की ऋतु माला

Dr. Shiv

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भारत की ऋतु माला, अनुपम, सजीव, निराली,
        
                                                    
                            
हर ऋतु लगभग दो माह की होती, छवि रचे मतवाली।

बसंत:
फाल्गुन-चैत्र जब बसंत आए, हरियाली का संदेशा लाए,
फूल खिले, कोयल गाए, खेतों में सरसों लहराए।
मन में जगाए नई उमंग, धरती नाचे श्रृंगार धरे,
सौरभ से महके सारा उपवन, खुशियों की धारा बहे।

ग्रीष्म:
बैशाख संग ग्रीष्म जो आए, ज्येष्ठ-आषाढ़ ताप बढ़ाए,
सूरज अग्नि बरसाए नभ से, धरती तपकर जल सी जाए।
छांव की चाहत घेरे मन को, वर्षा की उम्मीद लगाए,
लू के झोंकों संग पथिक, शीतल छाया को तरस जाए।

वर्षा:
श्रावण- भाद्रपद बादल लाए, अम्बर में छा जाएं घटाएं,
बिजली चमके, बूँदें बरसें, धरती हरियाली पा जाए।
नदियां उफनें, ताल छलकें, कुमुदिनी हर्षाए जल में,
सृष्टि समूची नृत्य करे तब, मेघ मल्हार के पल में।

पतझड़:(शरद ऋतु )
आश्विन-कार्तिक पतझड़ लाए, वृक्षों के तन सूने हो जाएं,
धूप गुनगुनी, संध्या लंबी, धरा पे पीले पत्र बिखराए।
शरद की आहट संकेत दे, नव जीवन फिर से आएगा,
सहने दो इस क्षणिक विराम को, मधुमास पुनः मुस्काएगा।

हेमंत:
मार्गशीर्ष-पौष में ठंडी बयार, चंदा छिटकाए चांदी की धार,
रातें लंबी, कुहासा गहरा, अलसाए दिन, सर्दी की मार।
हिमाचल ओढ़े बर्फ की चादर, नदियां बनें कांच समान,
जलते अलाव के संग सजे, स्मृतियों की मीठी तान।

शीत:
पौष-माघ का कड़वा मौसम, धुंध से ढक जाए धरा,
शीत लहर संग सिहर उठे तन, हड्डियों तक कंपकंपी भरा।
बर्फ से ढके हिमगिरि शिखर, झरनों का जल भी जम जाए,
पर ऋतु चक्र यह कहे सदा, नव जीवन फिर से आए।

यह ऋतु चक्र निरंतर चलता, नव जीवन के रंग संजोता,
कुदरत की अनुपम यह माला, मन-प्राण को हर पल मोहे।
हर ऋतु की अपनी छवि है, अपनी सुगंध, अपनी पहचान,
मिलकर सब रचती सृष्टि की, अनुपम, अद्भुत, सुंदर जान।
-शिव राय पुरी
 
एक वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Parul Bhaktani

1570 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10106 कविताएं

View Profile