“बदलते गृहस्थ का गौरव”
पत्नी थी घर की रानी, प्रेम की धारा,
उसके स्नेह से महकता जीवन सारा।
रोटी में स्वाद, पकवान में ममता,
उसके हाथों से जन्म लेती समृद्धता।
बच्चों की हँसी, बुज़ुर्गों का मान,
भाई‑बहनों में अपनापन की जान।
उसके त्याग से घटती निर्भरता,
उसके प्रयास से बढ़ती सम्पन्नता।
पति का पसीना, परिवार का सहारा,
उसकी मेहनत से चलता गुज़ारा।
कमाई से सजता घर का आँगन,
संस्कारों से महकता जीवन‑चमन।
कठिन समय में दीप जलाती पत्नी,
त्याग से उजियारा करती रहती पत्नी।
होती स्वतंत्रता का मधुर अहसास,
परिवार का प्रेम ही उसका विश्वास।
उसके हाथों में सुख का दीप,
उसके दिल में परिवार की प्रीत।
गृहिणी बनती घर की आधार,
सम्मान, आदर, प्रेम का उपहार।
समय बदला, सोच बदली,
परिवार की निर्भरता भी बदली।
अब दोहरी आय है आधारशिला,
पर बढ़ते खर्चों ने बोझ बना डाला।
बच्चों का पालन‑पोषण कठिन हुआ,
आर्थिक स्थिति ने गहरा विचार दिया।
छोटा परिवार ही है उद्धार,
कियोंकि सामाजिक स्तर रखना है बरकरार।
जीवन की राहें संग‑संग चलें,
कामकाज और घर दोनों पलें।
सहयोग ही असली धर्म बने,
साथ निभाने से कर्म खिले।
दोनों कमाएँ, दोनों थकें,
सपनों की सीढ़ी साथ चढ़ें।
पर रिश्तों की गर्माहट न खोएं,
तनाव की आँधी में न रोएं।
सुबह की धूप, रात का साया,
मिलकर बाँटें जिम्मेदारी का पाया।
न कोई बड़ा, न कोई छोटा,
समझ का यही सूत्र मोटा।
पैसे से घर सजता है,
पर चैन कहाँ मिलता है?
ईएमआई, किराया, खर्चों का बोझ,
प्यार से ही हल होता रोज़।
दोहरी आय है जीवन का सहारा,
पर न बने तनाव का किनारा।
थोड़ा ठहरें, थोड़ा सुनें,
साथ मिलकर जीवन चुनें।
थकान में भी मुस्कान लाएँ,
प्यार से रिश्तों को और सजाएँ।
काम और घर का संतुलन यही कहे,
साथ मिलकर जीवन रंग भरे।
-शिव राय पुरी