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शिक्षा का मर्म

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समय से पहले पहुँचकर हम, भर देते थे अपनी क्लास,
        
                                                    
                            
सीखने की मन में होती थी, एक अनूठी सच्ची प्यास।
गुरु का आना, पढ़ाके जाना, नियम बड़ा ही था कठोर,
ध्यान लगाकर सुनते थे सब, मचता न था कोई शोर।

न था हाथ में मोबाइल तब, न बंक मारने का विचार,
ईश्वर के उस अवसर को हम, लेते थे सहर्ष स्वीकार।
आज की पीढ़ी खोज रही बस, सहूलियत और केवल आराम,
इस 'फ्लेक्सिबल' ढर्रे ने तो, बिगाड़ दिया है सारा काम!

केवल थ्योरी रट लेने से, पास तो बच्चा हो जाएगा,
पर बिना व्यावहारिक अनुभव के, कैसे पार वो पाएगा?
बिना गुरु के मार्गदर्शन के, अधूरा है हर एक ज्ञान,
अनुशासन ही गढ़ता है, इंसान को असली इंसान।

मनोरंजन की चाह में बच्चे, भूल रहे हैं अपनी राह,
नींव हिल रही शिक्षा की, पर किसी को न इसकी परवाह।
छोड़ो आलस, तजो बहाने, समझो तुम शिक्षा का मर्म,
सच्ची निष्पात और अभ्यास ही, जीवन का है सच्चा धर्म!
2 महीने पहले
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