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सत्ता की चक्की और दो पीढ़ियाँ

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक तरफ़ हैं वो वरिष्ठ, जिनकी उम्र ढली इस काम में,
        
                                                    
                            
हज़ारों अनुभव समेटे, बीत गए सब शाम में।
बरसों सींचा जिस चमन को, अपनी मेहनत-खून से,
आज वही बेगाने लगे, इस नए नियम के जुनून से।

लगता है उनको—'जो गढ़ा हमने, वो सम्मान कहाँ गया?
उम्र भर का तजुर्बा हमारा, पल भर में बेजान हुआ?'
अहम नहीं, यह पीड़ा है कि पूछ नहीं अब होती,
वरिष्ठों की आँखों में भी, छुप-छुप के गिरती मोती।

दूजी ओर कनिष्ठ खड़े हैं, सपनों की गठरी बाँधे,
नई सोच और नए तरीक़े, कंधों पर अपने साधे।
बरसों चाहा एक अवसर, कि हम भी कुछ कर जाएँ,
पर बंद दरवाज़ों के आगे, कब तक शीश झुकाएँ?

उन्हें लगे—'क्या नया सोचना, अपराध हमारा ठहरा?
क्यों हर क़दम पर लगा हुआ है, बंदिश का यह पहरा?'
कनिष्ठ भी तो बेबस हैं, जो सिद्ध स्वयं को करना चाहें,
पर हर मोड़ पर रोक रही हैं, अनदेखी की राहें।

न वरिष्ठ की पीड़ा झूठी, न कनिष्ठ की आस ख़राब,
पर बीच चक्र में पिसता देखो, शिक्षा का यह ख़्वाब।
एक तरफ़ तजुर्बे की शक्ति, दूजी तरफ़ नई उड़ान,
जब तक दोनों हाथ न मिलें, कैसे बचे संस्थान?

छोड़ो कौन बड़ा या छोटा, समझो दोनों की मजबूरी,
सम्मान और अवसर का मेल ही, मिटाएगा यह दूरी।
नियम वही जो संतुलन लाए, सबका मान बढ़ाए,
वरिष्ठ का अनुभव, कनिष्ठ का साहस—मिलकर नाव चलाए!
2 महीने पहले
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