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रिश्तों का पाठ्यक्रम — भाग २: 'सगे रिश्ते बनाम बाहरी दिखावा'

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गर शिकायत है तो फिर ढोंग का नाता न रखो,
        
                                                    
                            
फोन पर टाइमपास करने की ये आदत न रखो!
न किसी के अच्छे में आओ, न बुरे में आओ,
मुँह मोड़ लो ऐसा कि फिर कभी नज़र न आओ!

सोचते हो कि नए पड़ोसी ही सब संभाल लेंगे?
दोस्त-यार ही तुम्हें हर विपत्ति से निकाल लेंगे?
ज़रा मन की आँखें फाड़कर देखो अब यह नज़ारा,
क्या सगे रिश्तेदारों के बिन चलेगा काम तुम्हारा?

बच्चे के अन्नप्राशन में मामा नहीं आया तो क्या होगा?
शादी में बुआ बिछिया न पहनाए, तो काम चलेगा क्या?
जूता चुराई में अगर साली ही ना हो महफ़िल में,
तो कौन हक़ से रस्म निभाएगा उस रंगीन माहौल में?
और कन्यादान के मंडप में जब बाप-ताऊ ना हों खड़े,
तो क्या बाहर के दोस्त आके वो फ़र्ज़ निभाएंगे बड़े?

अगर रिश्तेदारों से इतनी ही चिढ़ और तकलीफ भारी है,
तो क्या हर रस्म में गैर-बंधुओं से काम चलाने की तैयारी है?
अब ज़रा सिक्के का दूसरा पहलू भी आज़मा के देखो,
जिन दोस्तों को सगो से बड़ा मानते हो, उन्हें आज़मा के देखो!

उनकी ज़रूरतों में भी तुम्हें, हर पल खड़े ही रहना होगा,
ज़रा-सी चूक हुई जो तुमसे, वो रिश्ता भी खोना होगा!
अगर शर्तें और महत्वाकांक्षाएं, छिपी हुई हैं हर रिश्ते में,
तो क्यों न फिर सगो के साथ ही, निभा लिया जाए इस किश्त में?

क्योंकि बड़ी रस्मों और कठिन मोड़ों पर, सगा ही काम में आएगा,
ग़ैर का क्या है, वो तो मुसीबत आते ही मुँह मोड़ जाएगा!
ज़िंदगी की जब फटी चादर पर, तुम नए रंगीन पैबंद लगाओगे,
सजावट के चक्कर में जनाब, अपने ही हाथों छले जाओगे!
पराए पैबंद जब रंग छोड़ेंगे, तो सच में तुम्हारी जान जाएगी,
तब अपने ही रंग के पैबंद की कीमत, तुम्हें बहुत देर में समझ आएगी!

इसलिए घर में जब फूट पड़े, तो थोड़ा शांत होकर हट जाओ,
न गुस्से में रिश्ते तोड़ो, न गैर-ज़रूरी दूरियाँ बढ़ाओ।
दोनों पक्ष ध्यान रखें—कोई तीसरा पैबंद बनकर न जुड़ने पाए,
क्योंकि एक बार पराया रंग चढ़ जाए, तो असली रंग ढल जाए!

जैसे कच्चे रंग से धब्बेदार हुई चादर फिर असली रूप नहीं पाती,
वैसे ही तीसरे के आने से रिश्तों की मर्यादा कभी लौट नहीं पाती।
यह सोच कि दोस्त-यार सालों-साल रिश्तेदार बन चलेंगे,
बस एक मुग़ालता है... अंत में केवल अकेलेपन के दिए ही जलेंगे!

 
3 घंटे पहले
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