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खामोश गलतफहमियां

Dr Preeti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख्याल था कि तुम चैन से संवरने लगे,
        
                                                    
                            
सो हम भी सब्र का घूंट पी के मरने लगे।

तुम्हें लगा कि हमें कोई दुख नहीं पहुंचा,
हम इस गुमान में तन्हाइयों से डरने लगे।

पहली आवाज की सरहद को तोड़ता कौन,
ज़माने भर की अनाओं को आज छोड़ता कौन।

तकल्लुफों की दीवार दरमियां ही रही,
किसको खबर थी कि खामोशियों को तोड़ता कौन।

हमें था ज़ऊम कि तुम आओगे पकड़ने हाथ,
तुम्हें था मान कि हम ही सहेंगे हर एक मात।

इसी गुमान की बाजी में सब फना हुआ,
दोनों ही जीत के हारे हैं आखिरी वो रात।

समझते रहे हम कि तुम जी रहे हो खुशियों में,
तुम्हें लगा कि हम भटके नहीं अंधेरों में।

नतीजा ये हुआ आखिर कि दोनों घुट के मरे,
एक दर्द जलता रहा दो दिलों के कोनों मे

 
एक महीने पहले
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