गृह न रहा, अब श्मशान भया,
हर नाता जर्जर, मर्ज़ भया।
अंतर्कलह का विष बहता,
दीमक दशा, नींव ढहता।
नव वधु देवरानी कहलाई,
जेठानी ने गुलामी पहनाई।
दासी-सा श्रम करावत क्षण-विपुल,
देवर को सिखलावत कुटिल अनुकूल।
देवर को उकसावत कुबुद्धि अपार,
"निज स्त्री का करो शोषण-व्यापार।"
दुराचार की शिक्षा पढ़ाई,
वधु आर्तनाद करे, कोई न आई।
एक दामाद का आदर अनूठा,
दूजे को तिरस्कार-विष बूझा।
सगी बहनों के बीच जलाई ज्वाला,
बहनापा हुआ दग्ध-हवाला।
बेटी को न मायका न ससुराल,
द्वार-द्वार पर अपमान-जंजाल।
चचा-बंधु भी पूछ न पाएँ,
भगिनी पर न कोई हुलसाए।
चाची-मामी-भाभी-बूआ,
खुसपुस का महाशोर हुआ।
स्वजन एक-दूजे को देख न पाएँ,
कलुष-दृष्टि में बैर बसाएँ।
स्वार्थ-सिद्धि को गधे को बाप बनाया,
इस्तेमाल का यह दम्भ-छल-माया।
पर जब मिलकर उबारने आए,
तब बिखरते गृह को और गिराए।
हे अंतर्यामी! ऐसे गृह की सुध लीजे,
जहाँ स्वजन ही रोग बन जाएँ।
सीलन-ग्रस्त भित्तियों में,
बस "त्राहिमाम" की पुकार बसे।
भगवन्! अब तुम ही करुणा बरसाओ,
यह व्याधिग्रस्त आशियाँ स्वस्थ बनाओ।
भगवान बचाओ, भगवान बचाओ।