रावण ज़िंदा हैं ...
ना रावण का अब वो रूप रहा
ना सोने की वो लंका हैं
मन के भीतर झाँक के देखो
पाप का बजता डंका हैं।
जो रावण हर साल जलाते
मैदानों में भीड़ जमाकर
वो ऊँचे ऊँचे रावण के ढाँचे
जल जाते हैं बस राख बनकर।
असली रावण घूम रहे हैं
सड़कों पर, बाज़ारों में
कभी नफ़रत के नारों में तो
कभी झूठ के अख़बारों में।
मासूमियत को जो कुचले,
वो हैवानियत अब भी ज़िंदा हैं
सच्चाई लज्जित हैं जहाँ,
वहाँ इंसानियत शर्मिंदा हैं।
जो स्त्री के सम्मान को छले
दूसरों की ख़ुशियाँ को छीने
अहंकार और लालच का रावण
ज़हर जो घोलें सबके सीने।
मर्यादा के राम अब कैसे से आएँ
जब छल-कपट का वास हैं
रावण तो अमर हैं यहाँ,
बस राम का ही बनवास हैं।
नजरों पर पट्टियाँ बाँधकर
हम कब तक सच को झुठलाएँगे?
रावण बाहर तो तब मरेगा
जब भीतर के राम जगाएँगे।
कब तक यूँ खोखले तमाशों के
हम हर साल मेले सजाएँगे?
सुरक्षित जब बेटियाँ ही नहीं घर में
तो किस बात का जश्न मनाएँगे?
पुतले जलाना छोड़ दो लोगो
इतिहास यदि बदलना हैं
अपने अंदर के रावण को
पहले खुद ही जलाना हैं।