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न कोई सती न कोई दासी ...

Dr Mahesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            न कोई सती,न कोई दासी,न पाखंड का दंश लिए
        
                                                    
                            
खुले गगन में उड़ना हैं अब,अधिकारों को संग लिए

अँधियारे युग की जंजीरें,अब हम पर तरस न खाएँगी
संवेधानिक अधिकारों से,नारियाँ इतिहास बनाएँगी

न कोई सती, न कोई दासी,न पाखंड का दंश लिए
खुले गगन में उड़ना हैं हमको,अधिकारों को संग लिए

सदियों तक सहती आईं,घुट-घुट कर अब वो साँस नहीं
रीति-रिवाजों के नाम पर, छल कपट अब पास नहीं

अधिकारों की पावन ज्योति,जीवन में उजियारा हैं
स्वाभिमान से जीने का अब,यह हक सिर्फ हमारा हैं

संविधान ने जो अधिकार दिए हैं,उसे न अब हम खोने देंगे
पाखंडवादी सोच के आगे,मस्तक न अब हम झुकने देंगे

न कोई सती, न कोई दासी,न पाखंड का दंश लिए
खुले गगन में उड़ना हैं हमको,अधिकारों को संग लिए

ज्ञान, कर्म और शक्ति बनकर,हर एक पथ पर बढ़ना हैं
आज़ादी के अंबर पर अपना,नाम हमें अब लिखना हैं

अन्धविश्वास की दलदल में अब,फिर से न क़दम बढ़ाएंगे
खुले गगन की आज़ाद हवा में,आज़ादी के गीत गाएँगे

संविधान हमारी शक्ति हैं,आँच न इस पर हम आने देंगे
सपनों के इस नीले नभ पर हम,कोई धुंध नहीं छाने देंगे

न कोई सती, न कोई दासी,न पाखंड का दंश लिए
खुले गगन में उड़ना हैं हमको,अधिकारों को संग लिए

रुढ़ियों की दीवारें तोड़ी, नई सुबह का दीप जला
स्वाभिमान के पथ पर चलकर, बदला हुआ हमें दौर मिला

छल-कपट के तमस को चीरकर,शक्ति अपनी पहचानी हैं
स्वतंत्र भारत की नारी हैं हम,न बेबसी और न बेचैनी हैं

सपनों को अब पँख मिले हैं,पंख फैलायें उड़ना हैं
पीछे मुड़कर न देखें कभी,बस आगे ही हमें बढ़ना हैं

न कोई सती, न कोई दासी, न पाखंड का दंश लिए
खुले गगन में उड़ना हैं हमको,अधिकारों को संग लिए

 
4 घंटे पहले
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