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ईश्वर और विषमता...

Dr Mahesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हे ईश्वर, तुम्हें पाप लगेगा,शोषितों का अभिशाप लगेगा
        
                                                    
                            
शोषित ने जो कष्ट सहा है,उस पीड़ा का हिसाब लगेगा

तुमने तो कहा था श्लोकों में, कोई भेद न था मनुष्यों में
गुण-कर्म ही आधार बने थे, सब ढले तुम्हारे रंगों में

सात्विक को ज्ञान का नाम दिया, राजसिक को कर्म का मान दिया
जिस पसीने से यह सृष्टि बनी, उसे क्यों तमोगुण नाम दिया?

जो मिट्टी से सोना उपजाए, जो पत्थर तराश रूप बनाए
सभ्यता की नींव जो रोज़ ढाले,वो आलसी कैसे कहलाए?

जिस हाथ ने तेरी मूरत बनाई,उसको ही तूने नीच बनाया
मंदिर की सीढ़ी चढ़ने पर,उनका ही फिर खून बहाया?

हे ईश्वर,तुम्हें पाप लगेगा,शोषितों का अभिशाप लगेगा
जो बह चुका है लहू ज़मीं पर, हर बूंद का हिसाब लगेगा

मूर्ति गढ़ी जिसने निष्ठा से, वो द्वार पर ही दुत्कारा गया
जिसके श्रम से जग जगमगाया, वो अंधकार में मारा गया

यदि कर्म ही सच्चा धर्म हैं,तो फिर क्यों छीने अधिकार?
यदि सब में बसा है रूप तेरा,फिर क्यों बांटा तुमने संसार?

वर्णों के भेद में जबसे,मनुष्यों को तुमनें बाँटा हैं
शोषितों ने भाग्य मानकर,दुखों में जीवन काटा हैं

युग-युग से सहे हैं जो अत्याचार,अब उन दुखों का हिसाब लगेगा
फैलाई समाज में जो वैमनस्यता,उस दुष्कर्म का तुम्हें पाप लगेगा

तुम्हें बनाया,तुम्हें पूजा,कुछ तो तुम ईमान रखो
सबके बराबर उनको भी कर दो,इतना तो सम्मान रखो

अगर न्याय का रूप बचा हैं तुममें,तो सत्य का प्रमाण रखो
इंसान को इंसान समझकर,उनके सामर्थ्य का सम्मान रखो

जिस मिट्टी से सबको रचा, उस मिट्टी का सम्मान करो
भेदभाव के इस पाखंड का, ईश्वर अब अवसान करो

यदि चुप बैठे तुम अब भी रहे, तो तेरा हर दर सूना होगा
श्रम की ताक़त जागेगी जब,न्याय का स्वर फिर दूना होगा

तुमने जो अन्याय किया हैं,उससे तो पाप कई गुना बढ़े हैं
मनुष्य से मनुष्य में घृणा फैली, गृह-युद्ध के द्वार खड़े हैं

चतुर्वर्ण की बातों से,मानवता आज रूठी हैं
धरती पर आकर यह कह दो,वर्णों की बातें झूठी हैं !

 
एक महीने पहले
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