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देश के मुहाफ़िज़ों ... ज़रा आँखें तो खोलो

Dr Mahesh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐ देश के मुहाफ़िज़ों ... ज़रा आँखें तो खोलो
        
                                                    
                            
सच्चाई जो चुभती हैं,कम से कम वह तो बोलो

दुनिया रोने नहीं देती, भूख हमें सोने नहीं देती
दिलों की बेबसी चेहरे को,हंसने भी नहीं देती

अजब दस्तूर हैं साहब,अजब यह दौर आया हैं
ज़मीं भूखी है और इंसां ने,सोने पर दिल लगाया हैं

सेंसेक्स की ऊँचाइयों पर,महफ़िलो में नोट बरसतें हैं
आधी आबादी हाथ आज भी,दो रोटी को तरसते हैं

भुखमरी सूचकांक में हम,सौ के पार खड़े हैं
तरक्की के सुनहरे ख़्वाब,मिट्टी में पड़े हैं

महँगाई की ये मार हमें,जीने भी नहीं देती,
दुनिया रोने नहीं देती, भूख हमें सोने नहीं देती

सोने की कीमत तो, समझ से पार होती हैं
सोने की हसरत भी,सड़कों पर रोती हैं

तिजोरियाँ तो भर गईं,पर थालियाँ हैं खाली
कोई भूखा कैसे मनाए,ईद और दिवाली

किस्मत अपनों के हक़ का,दाना भी नहीं देती
दुनिया रोने नहीं देती,भूख हमें सोने नहीं देती

कहीं अनाज के ढेरों को,चूहे कुतर जाते हैं
कहीं बच्चे खिलौनों की जगह, कूड़ा उठा लाते हैं

ऐ देश के मुहाफ़िज़ों ... ज़रा आँखें तो खोलो
सच्चाई जो चुभती हैं,कम से कम वह तो बोलो

ये खामोशी हमें चैन से, रहने भी नहीं देती,
दुनिया रोने नहीं देती, भूख हमें सोने नहीं देती

सोने का मूल्य भारी है,और जान सस्ती हैं
अंधेरों में ही बसती अब,गरीबों की बस्ती हैं

भूख सोने नहीं देती... दुनिया हमें रोने नहीं देती

ऐ देश के मुहाफ़िज़ों ... ज़रा आँखें तो खोलो
सच्चाई जो चुभती हैं,कम से कम वह तो बोलो।

 
4 महीने पहले
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