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मौन का प्रेम

Dr Lokesh sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी प्रेम, साथ चलने का नाम नहीं होता,
        
                                                    
                            
किसी की राह से चुपचाप हट जाने का साहस होता।
हर जीत, पाने में नहीं, खो देने में भी छिपी रहती है,
कुछ मुस्कानों की कीमत, अपनी आँखों से चुकानी पड़ती है।
नदी भी तो किनारों से बंधी रहकर,
समुद्र को अपना समूचा अस्तित्व सौंप देती है।
वह हारती नहीं, स्वयं को विस्तार देती है,
त्याग की धारा में अमर हो जाती है।
कुछ रिश्ते आवाज़ नहीं माँगते,
वे मौन की भाषा में जीते हैं।
जहाँ अधिकार पीछे रह जाते हैं,
और दुआएँ आगे बढ़ती हैं।
जो सच में प्रेम करते हैं,
वे अपनी इच्छाओं का शोर दबा देते हैं।
किसी अपने की एक मुस्कान के लिए,
अपने सपनों को भी विदा कह देते हैं।
दुनिया इसे हार का नाम देती है,
पर समय इसे सबसे बड़ी विजय कहता है।
क्योंकि प्रेम का सर्वोच्च रूप वही है,
जहाँ इंसान प्रेम नहीं, अपना अधिकार छोड़ देता है।
3 महीने पहले
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