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तुम मेरी दर्पण हो

Dobish Warekar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं ऐसे विचार करता हूं ।।
        
                                                    
                            
और तेरा ही चिंतन करता हूं।।
क्योंकि तुम तो मेरी दर्पण हो।।
जब तुम मेरी प्रतिबिम्ब हो तो।
उन दर्पण में कोई क्यों निहारे
तुम तो मेरी धड़कन हो तो।।
किसी का दिल तेरे खातिर
धड़के ही क्यों।।
तुम मेरी तड़पन हो।।
उस दर्पण की बिम्ब हो।।
फिर और कैसे तड़पें
उस दर्पण में झांकने को।।
तुम मेरे चेहरे की दमक हो।।
मेरे आँखों की नूर हो।।
फिर तुम्हें कोई दर्पण
से क्यों पूछे।।
की तुम मेरी क्या हो।।
मैं ऐसे विचार करता हूं ।।
और तेरा ही चिंतन करता हूं।।
ऐसे दर्पण को कोई क्यों घूरे
इतनी सुंदर सी दर्पण में
कोई क्यों समना चाहे।।
2 महीने पहले
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