साढ़े साती और अढ़ैया हूँ।।
न न मुझे शनि मत पुकारना
मैं तो बस न्याय का देव हूं।।
तेरे कलुष का चिंता हूं
तेरे सुकृत का चिंतन हूं
साढ़े साती में कठिन
परीक्षण हूं
जो इस पड़ताल में कुंदन
बन निकला
उसका पूर्ण विश्वास हूं।।
सत्कर्म पे पथिक को
चलने का दिखाता आईना हूं
जो तू जैसा तू करेगा
वैसा ही तुझसे भरवाऊंगा
तूने तो किल्विश से बदरंग
कर डाली अपनी
हाथों की लकीर
मैं तो साढ़े साती के मार्ग
ही जा रहा था
पर तेरी अघ ने
मुझे लाया खींच
फिर तेरे यही लकीर
बना दिया तुझे फकीर
तब तुझे मैंने लिया भींच
राह को मैं साढ़े साती
परिवर्तन करता नहीं
परिवर्तन तो तेरे काज ही
मुझे करा देते है
दिन रात असत्य का
करते रहो तुम साथ
तो धरम के फल का
कैसे मिले तुम्हें हाथ
कपट मन में जो रखोगे तो
तोड़ देंगे असल
जीवन का ख्वाब
साढ़े साती ढैया में भी
मेरा बिल्कुल सरल
है स्वभाव
मैं न किसी को
करता आभाव
सत् मार्ग पर जो
चलता जाता
उसके कली काल में
मेरा रहता प्रभाव
मैं तो न्यायाधीश
हूं न्याय देव
मन में रहे सदा तेरे खोट
तो करुआ तेल साढ़े
साती पाँव में
रगड़कर भला कैसे
भरे तेरे घाव में
मत हो तुझे
अपने पे गुमान
वर्णा भेंट चढ़ जायेगा
तेरे सारे अरमान
बाहर दीप से प्रकाश
क्यों फैला रहा
अंदर तो पाप की घनी
काली रात की घड़ा
इस धाम से उस धाम
काहे को जाता
जब मन में ही बैठा हो
चोर की काली छाता
क्रोध,लोभ और
स्वार्थ को छोड़
कर परहित भलाई
चल सबकी ओर
जो करते है श्रम
उनका होता
परम धरम
मैं उन लाचारों का
सच्ची आस
जो खेतों में
करते मेहनत
उनका सांस
कर्म पथ का
सदा विश्वास
जिनमें है कूट
कूट कर अपने
में आत्मविशास