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मोम दिया

Dobish Warekar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंधेरे को चीरती हुई।।
        
                                                    
                            
वो दिया प्रकाशित।।
होती रही।।
मोम दिया शांत।।
जलती खड़ी।।
ठोप-ठोप पिघलती।।
जाती रही।।
राहगीरों को राह
दिखाती रही।।
कोमल इतनी की।।
कोई मशल दे
तो हो जाती।।
एकदम बुकनी।।
हर आंधी में
जलना नहीं छोड़ी।।
अपने अंत का
तमाश नजदीक
आते देखी।।
पर चेहरे पे
तनिक भी शिकन
न ही थी
अंधेरे के लिए।।
उजाला बनकर
अपने जलती रही।।
पिघलती रही।।
वो मोम दिया ........
जैसे मेरा प्रेम
उन कुंजन के लिए।।
जो हर पल स्वयं
जल कर भी
दूसरों की मुस्कुराहट
बरकरार रखता।।
जब भी जलता।।
वो अंधेरा मुस्कुराता।।
मोम जब जलकर।।
पिघलता और।।
बूंद-बूंद जल
रूप धरता।।
तब और ।।
छोटा सा बूंद में
चेहरा ही नज़र आता।।
अंधेरे को चीरती हुई।।
वो दिया प्रकाशित।।
होती रही।।
2 महीने पहले
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