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मन में ऐब लबालब

Dobish Warekar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन में ऐब लबालब
        
                                                    
                            
है भरी भरी।।
और मुख से भजे
सदा हरि हरि।।
फिर मंदिर में ।।
दर्शन को।।
जाने का क्या।।
लाभ सुहावे।।
मन के मलीनता।।
की धुलाई ना किया।।
और बदन को।।
धोके चकाचक
कर लिया।।
फिर संगम में।।
डुबकी लगाने।।
का क्या लाभ होवे।।
कभी मात पिता।।
की सेवा ही न किया।।
हरि हरि भजने।।
से क्या लाभ है।।
साधु संत वैष्णव
जन को मन से।।
कभी अभिवादन
न ही किया।।
और संगम में
नहाने चल दिया।।
भूखे नंगे पर
कभी दया।।
न ही दिखाई
और पाप मिटाने।।
संगम को भागे।।
यदि ऐसे ही
डुबकी लगाने से।।
पाप धूल जावे।।
तो उस संगम में।।
जलीय जीव तो
हमेशा डुबकी ही लगावे।।
फिर उनको क्यों
न मोक्ष मिल जावे।।
आस्था अगर
मन में है
तो दया परम
धरम की बदौलत
मन की सारे ।।
पाप धूल जावे।।
मन में ऐब लबालब
है भरी भरी।।
और मुख से भेजे
सदा हरि हरि।।
2 महीने पहले
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