मोहब्बत कहा बची, ज़माने में.
वफ़ा नदारत है, इस फ़साने में.
किस को किस से सरोकार हो,
मस्त है सभी अपने ठिकाने में.
चार पैसे, क्या बड़े, खजाने में,
लगे दूसरे को निचा दिखाने में.
तेरे बिना चैनों सुकून ना मिले,
मज़ा नहीं कही, आने जाने में.
हर कोई, मशरूफ है यहां तो,
दूसरों, पर, तोहमत लगाने में.
तुम ठहरे दूर के राही, मानसी,
वक्त लगेगा मिलने मिलाने में.
-धीरज साहू मानसी