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जागीरदार

Divya Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बचपन की जागीर का जागीरदार न समझ मुझे
        
                                                    
                            
बड़ी ख्वाईशो की मालकियत के ढोंग में
दो चार किश्तों में जिंदगी गुजार रहा हूँ
रोज बचपन से झगड़कर, समझदारी तेरा रुतबा बढ़ा रहा हूँ।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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5 वर्ष पहले
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