कर्ज़ - ऐ - वालिद
नस्लें चुकाती हैं।
अलविदा शंहर मेरे,
उधार नही हैं मुझ पर तेरा,
औलांद ने मेरी,
किसी और शंहर के
आसमां को,
अपनी छत बनाया है।