रीते दिन अब बीते
मिथिला में है सीते
पपीहे की प्यास बुझी
अंकुर सब फिर जीते.
तटबंधों ने अपने
पूरे किये जल सपने
बगुलों के लौट आये
बीते दिन फिर अपने.
लौटी हर कोंपल में
चुप बैठी कोयल में
यौवन की अंगड़ाई
सारस सी परछाईं.
खेतों की मेड़ो पर
सज निकले ये हलधर
सावन की बौछारें
आतीं हैं स्वागत कर.
पावस के मौसम में
देवों को प्रिय लगती
लीलाओं से भरती
सुन्दर सी ये धरती.
-दिनेश चौहान