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सुन्दर सी ये धरती

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रीते दिन अब बीते
        
                                                    
                            
मिथिला में है सीते
पपीहे की प्यास बुझी
अंकुर सब फिर जीते.

तटबंधों ने अपने
पूरे किये जल सपने
बगुलों के लौट आये
बीते दिन फिर अपने.

लौटी हर कोंपल में
चुप बैठी कोयल में
यौवन की अंगड़ाई
सारस सी परछाईं.

खेतों की मेड़ो पर
सज निकले ये हलधर
सावन की बौछारें
आतीं हैं स्वागत कर.

पावस के मौसम में
देवों को प्रिय लगती
लीलाओं से भरती
सुन्दर सी ये धरती.
-दिनेश चौहान
2 महीने पहले
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