अपनी माटी अपना वतन
सबको प्यारा अपना तन
वीरों ने अपनी कुर्बानी दी
अपनी कच्ची जवानी दी.
माँ बहनें बच्चे अब उनके
रहते देश में बन के तिनके
क़ब्ज़ा कर बैठे सब नेता
हक उनको कोई नहीं देता
आजादी बर्बाद हो गयी
बर्बादी आजाद हो गयी
अपराधी की पौ बारह
न्याय हुआ नौ दो ग्यारह
ऊँचे ऊँचे भवनों में अब
चोर उचक्के बैठे हैं सब
मिल-जुलकर रेवड़ी बंटती
रोज नई महफिल सजती
धरती मां चुप चुप रोती
बंजर कोख आँसू पीती
अंतहीन क्रम नित जारी
सबको केवल कुर्सी प्यारी.
दिनेश चौहान