टूटते तारों की तरह रोज ये मन टूटा है
देख लहरों की रवानी तन भी ये रूठा है
हाथ पतवार चली. संग कश्ती भी रही
इन हवाओं के. रुखों से किनारा छूटा है
-दिनेश चौहान