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उम्र कच्ची सोहबत में बुरी पड़ गईं

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब कभी भी बदलियों से घिर गई
        
                                                    
                            
रात पूनम की भी अमावस बन गई.

रूप की गठरी समेटे चल रही थी
भेड़ियों की दृष्टि पड़ते ग्रास बन गई .

उम्र कच्ची सोहबत में बुरी पड़ गईं
पंखुरी कली की ही पतझड़ बन गई.

पाँव नंगे जलती सड़क पर जब पड़े
जिसने भी देखा बूंद आँसू बन गई.

इस शहर की हवाओं में ज़हर बसता
मासूम कलियों की जान पर बन गई.
-दिनेश चौहान
एक महीने पहले
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