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उम्र कच्ची सोहबत में बुरी पड़ गईं

                
                                                         
                            जब कभी भी बदलियों से घिर गई
                                                                 
                            
रात पूनम की भी अमावस बन गई.

रूप की गठरी समेटे चल रही थी
भेड़ियों की दृष्टि पड़ते ग्रास बन गई .

उम्र कच्ची सोहबत में बुरी पड़ गईं
पंखुरी कली की ही पतझड़ बन गई.

पाँव नंगे जलती सड़क पर जब पड़े
जिसने भी देखा बूंद आँसू बन गई.

इस शहर की हवाओं में ज़हर बसता
मासूम कलियों की जान पर बन गई.
-दिनेश चौहान
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2 घंटे पहले

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