अनुशासन बिगड़ा जब जब
शासन होता तगड़ा तब तब.
समझ नहीं जिनको है कोई
निकली लड़ने वो कच्ची लोई .
तमाशबीन हुई भीड़ ये सारी
रील से हो गई सब की यारी.
हल की बात कोई नहीं करता
जिसको देखो हवा ही भरता .
धैर्य प्रतीक्षा नहीं शेष है अब
संघर्षों की मनसा ही है जब.
- दिनेश चौहान