जनता देश की, गुलामी में जी रही है
करों का जहर हर घूंट संग पी रही है.
कुछ लोग जाकर शिखर पर बैठ गये
लूट कर हमको फिर हमीं से ऐंठ गये.
लोकतंत्र है पर लोक का लोप हो गया
तंत्र की बलि चढ़ी राजा गोप हो गया.
हाथों को काम नहीं मुँह को विराम नहीं
ऐसी कोई बात नहीं जहां राम नाम नहीं.
पागलों की भीड़ है खाली हर नीड़ है
जुबांने कैंची की तरह झूंठ खड़े चीड़ है.
-दिनेश चौहान