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जब जब बदली ये आती है

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बदली जब जब ये आती है
        
                                                    
                            
तन में क्यूँ आग. लगाती है.

मन हवन कुंड सा जलता है
अंदर ही धुआं सुलगता है
पानी की थोड़ी सी बूंदे
बौछारों सा पड़ जाती हैं.

घर्षण स्मृतियों का होता
चिंगारी अंतस में उठती
सदियों टूटे इस खंडहर में
लौट प्रतिध्वनि आती है .

तारावलियाँ नभ में छुपतीं
घन के पर्दे का ओट लिए
कुछ किरणें शशि मुख पर
निष्यंदित हो आ जाती हैं.

अन्दर अंदर आहें भरतीं
बाहर निर्झर बनके झरती
आंखें उसकी दोनों जब
बूंदों से तब भर जाती हैं.
-दिनेश चौहान चित्रकूट धाम
3 महीने पहले
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