लिख डाली सारी बरसातें मैंने तेरे होंठो पर
गर्म हवा के थोड़े किस्से मन में भी लिख लेने दो.
नर्म उंगलियों संग हाथों पर स्वर जितने भी उभरे हैं
एक एक कर सारे अनुभव होंठो पर लिख लेने दो.
कितनी रातें जग कर काटी कितने दिन तक तड़पे हैं
लेखाजोखा दर्द का सारा दिल पे अपने लिख लेने दो.
सर्द हवाओं में हम ठिठुरे सपने जम कर जब बर्फ हुये
एकाकी बीती उन रातों का किस्सा हर लिख लेने दो.
जन्म अभी कितने बाकी कितनी बार मिलेंगे हम तुम
छोड़ो इन सारी बातों को मुट्ठी का हरपल लिख लेने दो.
-दिनेश चौहान