तप्त तवे सी
देह अब हमारी
बूँद वर्षा तू.
सारस मन
उड़ता रह गया
नभ में तेरे.
हुए क्यों ये
रक्तिम कपोल
लाज से तेरे.
उच्छ्वासों ने
स्वीकृति भर ली
आलिंगन की .
यादों में तेरी
नींद हराम हुई
व्याकुल मन.
जब से तेरे
सपनों में खो गये
बौने हो गये.
मिट्टी के हम
शीशे की चमक में
हीरे से तुम.
-दिनेश चौहान