अँधियारी रातों में तारे ओट लिए बदली में छिपते
होंठों पर आकर तेरे चर्चे खुशियाँ मन की कहते .
धीरे से पुरवाई आ कर दस्तक दरवाजे पर देती
हृदय पटल के चक्षु को हर दृश्य में तुम ही दिखते.
-दिनेश चौहान