दूर तक सड़क पर कोई न था
पहाडियों के बीच
बदली बरसी और निकल गई
तितली बैठी फ़ूलों के ऊपर
बगिया के अन्दर
बूंदे सहमी और पिघल गईं .
झोंका बयार का कुछ यूं आया
खिड़की के बाहर
आंखें सहमी फिर सजल हुईं
बिजली चमकी बादल गरजे
मन के अन्दर
यादें झंझावाती दहल गईं
सब कुछ पहले ही जैसा था
अपने दिल में
फिर क्यों तन मन में चहल हुई.
-दिनेश चौहान