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दिन मुट्ठी से फिसल रहे

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दिन मुट्ठी से फिसल रहे
        
                                                    
                            
सपने अपने मसल रहे.

दूजे आँगन की खुशियां
देख के अपने मचल रहे.

देख तरक्की भाई की
दूजे भाई विकल रहे.

बढ़े ताड़ से जितने भी
जगह अपनी अटल रहे.

शशकों ने नींदे काटी
पर कच्छप सचल रहे.
-दिनेश चौहान
2 महीने पहले
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