दिन मुट्ठी से फिसल रहे
सपने अपने मसल रहे.
दूजे आँगन की खुशियां
देख के अपने मचल रहे.
देख तरक्की भाई की
दूजे भाई विकल रहे.
बढ़े ताड़ से जितने भी
जगह अपनी अटल रहे.
शशकों ने नींदे काटी
पर कच्छप सचल रहे.
-दिनेश चौहान
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