नदिया प्यासी रह गई बह गया सारा जल
बाहें खाली रह गईं घाट बचा. दलदल .
प्रेम में डूबे लोग कुछ जा पहुँचे जब घाट
उठी तरंगे हृदय में. रहे जोहते बाट .
बहती धार में काठ का टुकड़ा जैसे जाय
विरही मन भी पात सा बार बार उतराय .
यादें सारी बह गयीं उस धार नदी के संग
प्रत्यंचा मन की खिंची धनुष हो गया भंग.
सावन भादों में रहीं. ऐसी कुछ बौछार
आंगन सूखा ही रहा मिला कहीं ना प्यार.
दिनेश चौहान